Friday, April 9, 2010

भगवान् महावीर के जन्म से पूर्व

महानुभावों! भगवान् महावीर के पूर्व भवों में आप पढ़ रहे हैं कि वे अभी स्वर्ग में हैं और इधर मध्य लोक की कुण्डलपुर नगरी में स्वर्ग से देवों ने आकर दिव्य नगरी की रचना कर दी । उस नगर में सुन्दर नन्द्यावर्त महल सात मंजिल का बना दिया, जिसमे राजा सर्वार्थ और रानी श्रीमती निवास करने लगे ।
आज से लगभग २६०८ वर्ष पूर्व उन राजा सर्वार्थ के पुत्र सिद्धार्थ का विवाह वैशाली के राजा चेटक की पुत्री त्रिशला के साथ हुआ । पुनः सिद्धार्थ और त्रिशला सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे। आगे आप जानेंगे कि कुण्डलपुर में क्या होता है -----
आर्यिका चंदनामती

Tuesday, April 6, 2010

भगवान् महावीर दुसरे भव पूर्व !

महानुभावों! आप भगवान् महावीर के पूर्व भवों के बारे में जाना है कि उन्होंने कैसे अपने जीवन का उत्थान किया, महावीर बनने से द्वितीय भव पूर्व सोलहवें स्वर्ग में अच्युतेंद्र थेवहां देवांगनाओं के साथ सुख भोगते वे कभी-कभी मध्यलोक में भगवान् के समवसरण में दर्शन करने भी जाया करते थे
समवसरण में भगवान् की दिव्यध्वनी सुन कर तत्त्व चिंतन करते हुए वहां अपना समय व्यतीत करते थेआगे चल कर वे भगवान् महावीर की पर्याय में आने वाले हैं, अतः आप अगले ब्लॉग में उनका जीवन चरित्र पढेंगे
आर्यिकाचंदनामती

Saturday, March 27, 2010

भगवान् महावीर तीसरे भव पूर्व !

वह देव स्वर्ग से च्युत होकर मध्य लोक में आकर राजा नन्दिवर्धन के पुत्र नंदन हुएवहां मुनि से दीक्षा लेकर खूब ज्ञानाराधना की पुनः अंग - पूर्वों का ज्ञान प्राप्त करके सोलह्कारण भावना भाई और तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध करके अंत में समाधि मरण के द्वारा स्वर्ग में अह्मिन्द्र पद प्राप्त किया
आर्यिका चंदनामती

भगवान् महावीर चतुर्थ भव पूर्व !

महानुभावों! आपने भगवान् महावीर के पूर्व भवों के चित्रों को देख कर जाना है कि वह किस प्रकार से पुरुषार्थ करके अपने जीवन को महान बनाने में लगा है, वे देव गति के सुखों को भोग रहे हैं
जैन पुराणों में वर्णन आता है कि स्वर्ग में सूर्यप्रभ देव दिव्य सुखों का अनुभव करते हुए अपनी देवांगनाओं के साथ मध्य लोक में आकर सम्मेदशिखर आदि तीर्थ क्षेत्रों की वंदना किया करते थे
यह उनके पुण्य का प्रभाव ही थाइस प्रकार के पुण्य का संचय करने से शीघ्र मोक्ष सुख की प्राप्ति होती है
आर्यिका चंदनामती

Friday, March 26, 2010

भगवान् महावीर पांचवें भव पूर्व !

स्वर्ग से अपनी आयु पूरी करके देव ने मनुष्य भव धारण कर धातकी खंड द्वीप में प्रियमित्र चक्रवर्ती बन कर राज्य संचालन किया। पुनः वहां वैराग्य हो गया,तो दीक्षा धारण कर तपस्या की और समाधि पूर्वक शरीर त्याग करके वे बारहवें स्वर्ग में देव हो गए ।
महानुभावों! भगवान् महावीर के इन भवों से हमें शिक्षा लेना है कि कभी न कभी जीवन में संयम अवश्य धारण करना चाहिए ताकि एक दिन हम भी भगवान् बन सकें।
आर्यिका चंदनामती

Sunday, March 21, 2010

छठे भव पूर्व भगवान् महावीर !

स्वर्ग के सुखों का अनुभव करते हुए भगवान् महावीर के जीव ने वहां जिनेन्द्र भगवान् की खूब भक्ति की, और असीम पुण्य का संचय करते रहे।
यह पुण्यात्माओं का जीवन हम सब के लिए अनुकरणीय रहता है ।
आर्यिका चंदनामती

Saturday, March 20, 2010

सातवें भव पूर्व भगवान् महावीर!

राजा हरिषेण की पर्याय में उन्होंने श्रुत सागर मुनि के पास जाकर जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर सल्लेखना मरण पुर्वक शरीर का त्याग किया और स्वर्ग में देव हो गए।
इससे शिक्षा ग्रहण करना है कि मनुष्य गति पाकर संयम अवश्य पालन करना चाहिए।
आर्यिका चंदनामती